एक पद पर दस-दस दावेदार, सत्ता-संगठन दोनों परेशान
तपेश जैन
रायपुर। पद एक है और दावेदार दस तो संतुलन कैसे स्थापित हो? पद बंट गया तो कई मुंह फुल जाएंगे और कूल होने की कोई वजह बाकी रह पाएंगी। अभी तो कारण है सो कई मुद्दों पर नाराजगी के बाद भी नेताओं को कूल रहने की समझाईश दी जाती है और इसका पालन भी होता है। ये आंखों की शर्म का कम और सत्ता सुख का लालच ही यादा है कि सरकार की कमजोरियों और अफसरों की दादागिरी पर कतिपय नेता चुप्पी साधे हुए है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी ये मालूम है कि राजनीति के इस पैतंरे से ही वे निपकंटक राज कर सकते हैं। जो लोग आज उनके आगे पीछे रहे है पद नहीं मिलने पर पीठ पीछे गरियाने से भी नहीं चूकेंगे। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने अपनी दूसरी पारी में सवा साल बाद तक निगम मंडलों में कोई नियुक्ति नहीं की है। इसके चलते पार्टी के कई नेता हलाकान है कि आखिर इसमें विलंब क्यों किया जा रहा है।
यह बताना लाजमी होगा कि सन् 2008 दिसंबर में दूसरी बार मुख्यमंत्री चुने गए डा. रमन सिंह ने यह संकेत दिया था कि सन् 2009 मई में लोकसभा चुनाव के बाद निगम-मंडलों में नियुक्ति कर दी जाएगी। लेकिन राजनैतिक उठा पटक के चलते ऐसा ना हो सका। फिर यह चर्चा्र प्रकाश में आई कि नवम्बर 2009 में नगर निगम, पालिका चुनाव के बाद गठन हो जाएगा। इसके बाद पंचायत चुनाव 2010 जनवरी तक मामला टल गया। अब सभी इलेक्शन के बाद संगठन के पुर्नगठन ने मनोयन की सूची को रोक रखा है। इसी माह के अंत तक नए प्रदेशाध्यक्ष का नाम घोषित होने के बाद प्रदेश कार्यकारिणी का भी गठन होना है। अटकलें है कि यह मई माह तक खिंच सकता है। यानी निगम मंडलों के उम्मीदवारों को तब तक इंतजार करना पड़ सकता है।
राजनीति अटकलों, चर्चाओं और संभवनाओं से ही चलती है। सो किसकी नियुक्ति होगी और किसकी नहीं इस पर चर्चा करें तो विधानसभा चुनाव 2008 में जिन 17 विधायकों को पार्टी ने दुबारा टिकट नहीं दी उसमें से दो लोग बेहद सक्रिय है। पहला नाम है पूनम चंद्राकर का तो दूसरा विनोद खांडेकर का। श्री चंद्राकर महासमुंद जिले की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते है और विधानसभा चुनाव में इस जिले में भाजपा का सुपड़ा साफ हो गया है। सो सत्ता संतुलन के लिहाज से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व सरकार में होना ही चाहिए। लेकिन राजनीति तो राजनीति है इसलिए श्री चंद्राकर के विरोधी डा. विमल चोपड़ा फिर अडंगा लगा सकते है। दूसरी ओर श्री खांडेकर दलित बौध्दमार्गी है जिनकी बड़ी संख्या छत्तीसगढ़ में है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी कई लोग जुड़े है। संघ का दबाव श्री खांडेकर को कुर्सी तक पहुंचा सकता है। दोनों पूर्व विधायकों के अतिरिक्त पराजित नेता अजय चंद्राकर भी व्यवस्थापन चाहते है लेकिन उन्हें संगठन में महामंत्री बनाने की यादा संभावनाएं है। पूर्व निगम मंडलों के पदाधिकारियों की आस है कि उन्हें फिर से सत्ता कुंजी मिले। इसमें सुभाष राव और श्याम बैस को सफलता मिल सकती है। रायपुर शहर अध्यक्ष पद पर रतन डागा की नियुक्ति हुई तो आरडीए अध्यक्ष राजीव अग्रवाल बनेगें नहीं तो श्री डागा को उपाध्यक्ष बना सकते है। मंत्री पद के लिए ब्राम्हण वर्ग के बद्रीधर दीवान को हरी झंडी मिल सकती है। उन्हें लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग मिल सकता है तो विधानसभा उपाध्यक्ष पद कांग्रेस को समर्पित कर डा. रमन सिंह लोकतंत्र की स्वस्थ परपंरा पुन: कायम कर सकते है। बहरहाल क्या होगा, कब होगा यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि राजनीति में सबकुछ अनिश्चित होता है। कब कौन बदल जाए कहा नहीं जा सकता, इसलिए पॉलिटिक्स को भाग्य का खेल माना जाता है।
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